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दर्द क़यामत का है

                
                                                         
                            दर्द क़यामत का है पर इसका जतन भी नहीं कर सकता
                                                                 
                            
गम भी तेरा गम है इसको कम भी नहीं कर सकता

जनता हूँ तेरे खतो के मायने बदल से गए है
जला तो दू इनको पर दफ़न भी नहीं कर सकता

चाहता है की तराशू तेरे बदन को,अपनी क़लम से
गुल लिख भी दू तो पर गुलबदन भी नहीं कर सकता


मुहम्मद शहाबुद्दीन


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7 वर्ष पहले

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