विज्ञापन

रिश्तों का फरेब

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये भी दौर याद रहेगा, जिंदगी का
        
                                                    
                            
साफ दिल था, मगर इल्ज़ाम लगा गंदगी का।

शर्म ओ हया का बुत बने बैठे है, वो
जिनका जिक्र भी, तौहीन है शर्मिंदगी का।

गुनाह इतना हमारा था कि, तवज्जो दी रिश्तों को,
दुनिया ने नाम दिया इसको, नुमाइंदगी का।

भूख से बिलख रहे थे बच्चे, बुढ़िया गई बीवी,
एक हम थे, जिसे बस शौक था, अपनो की बंदगी का।

बदहाली में मुंह फेर लिया, अपनो ने,
अब समझ आया कि, ये बात है, कितनी संजीदगी का।

कोई किस्सा नहीं है ये, की समझ जाएंगे लोग,
ये तो एक आह है, बेचारगी का,

नज़र करता हु मैं ये शेर, उनलोगों को
जिनको है नाज बड़ा, रिश्तों की दीवानगी का।
एक वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Rabindra Aman

118 कविताएं

View Profile