ये भी दौर याद रहेगा, जिंदगी का
साफ दिल था, मगर इल्ज़ाम लगा गंदगी का।
शर्म ओ हया का बुत बने बैठे है, वो
जिनका जिक्र भी, तौहीन है शर्मिंदगी का।
गुनाह इतना हमारा था कि, तवज्जो दी रिश्तों को,
दुनिया ने नाम दिया इसको, नुमाइंदगी का।
भूख से बिलख रहे थे बच्चे, बुढ़िया गई बीवी,
एक हम थे, जिसे बस शौक था, अपनो की बंदगी का।
बदहाली में मुंह फेर लिया, अपनो ने,
अब समझ आया कि, ये बात है, कितनी संजीदगी का।
कोई किस्सा नहीं है ये, की समझ जाएंगे लोग,
ये तो एक आह है, बेचारगी का,
नज़र करता हु मैं ये शेर, उनलोगों को
जिनको है नाज बड़ा, रिश्तों की दीवानगी का।
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