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मदिरा कैसे भाता है

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कंठ गुजरता आग का दरिया,
        
                                                    
                            
अंतः दहन हो जाता है,

मदिरा कैसे भाता है।

रूदन, चीत्कार मची है घर में,
कुलशित वाणी, आवेग हो तन में,
बिना शर्म इठलाता है,

मदिरा कैसे भाता है।

मन दुर्बल और क्षीण है काया,
निपट असुर सा स्वांग रचाया,

भूत पिसाच नजर आता है,

मदिरा कैसे भाता है।

पितरों की यश, कीर्ति क्यूं,
दोनों हाथ लुटाता है,

मदिरा कैसे भाता है।
एक वर्ष पहले
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