कंठ गुजरता आग का दरिया,
अंतः दहन हो जाता है,
मदिरा कैसे भाता है।
रूदन, चीत्कार मची है घर में,
कुलशित वाणी, आवेग हो तन में,
बिना शर्म इठलाता है,
मदिरा कैसे भाता है।
मन दुर्बल और क्षीण है काया,
निपट असुर सा स्वांग रचाया,
भूत पिसाच नजर आता है,
मदिरा कैसे भाता है।
पितरों की यश, कीर्ति क्यूं,
दोनों हाथ लुटाता है,
मदिरा कैसे भाता है।
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