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अधूरी ख्वाहिश

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिंदगी जीने की ख्वाहिश थी,
        
                                                    
                            
मगर काट रहा हूं,

हसरतों और ख्वाबों को मै,
एक एक कर छांट रहा हूं।

कुछ पाने की उम्र शायद, बीत गई,
अब सिर्फ बांट रहा हूं,

फटे पन्ने है, कुछ जिंदगी की किताबों के
उन्हें मै, तन्मयता से साट रहा हूं।

अनकही सी टिश, बुझा हुआ मन
अपने बीते दौर को मानो, डांट रहा हूं।

अधूरे सपनो का शोर बहुत है,
हकीकत से सपनों को पाट रहा हूं,
एक वर्ष पहले
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