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अधूरी ख्वाहिश

                
                                                         
                            जिंदगी जीने की ख्वाहिश थी,
                                                                 
                            
मगर काट रहा हूं,

हसरतों और ख्वाबों को मै,
एक एक कर छांट रहा हूं।

कुछ पाने की उम्र शायद, बीत गई,
अब सिर्फ बांट रहा हूं,

फटे पन्ने है, कुछ जिंदगी की किताबों के
उन्हें मै, तन्मयता से साट रहा हूं।

अनकही सी टिश, बुझा हुआ मन
अपने बीते दौर को मानो, डांट रहा हूं।

अधूरे सपनो का शोर बहुत है,
हकीकत से सपनों को पाट रहा हूं,
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

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