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समझे किसे:.....

Mamta Tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नारी का कोई अपना
        
                                                    
                            
होता ही नहीं
वह पीड़ा कहे किससे
इतने रिश्तों में उलझी रहती
खुद को समझे कैसे
ना ससुराल में कोई अपना होता
ना मायका में कोई अपना होता
दो घरों के बीच उलझ जाती
ये गुत्थी उलझे कैसे
जिसका हाथ पकड़ के आती
वो भी उसके गमों
से अंजान रहता
दर्द बांटे किससे
जब बात आती नारी सम्मान की
ईश्वर भी मौन हो जाते
फरिश्ता समझे किसे.............।।

-ममता तिवारी
5 महीने पहले
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