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समझे किसे:.....

                
                                                         
                            नारी का कोई अपना
                                                                 
                            
होता ही नहीं
वह पीड़ा कहे किससे
इतने रिश्तों में उलझी रहती
खुद को समझे कैसे
ना ससुराल में कोई अपना होता
ना मायका में कोई अपना होता
दो घरों के बीच उलझ जाती
ये गुत्थी उलझे कैसे
जिसका हाथ पकड़ के आती
वो भी उसके गमों
से अंजान रहता
दर्द बांटे किससे
जब बात आती नारी सम्मान की
ईश्वर भी मौन हो जाते
फरिश्ता समझे किसे.............।।

-ममता तिवारी
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3 महीने पहले

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