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मेरी कलम हंसती भी है:कविता

Mamta Tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरी कलम हंसती भी है
        
                                                    
                            
मेरी कलम रोती भी है
ये खाती भी है
पीती भी है
जागती भी है
सोती भी है
नाचती भी है
गाती भी है
उठती भी है
बैठती भी है
चलती भी है
रूकती भी है
भेद मन की खोलती भी है
सच-सच बोलती भी है
शांति चाहती भी है
क्रांति लाती भी है
ना किसी से डरती है
ना किसी से लड़ती है
मेरी कलम मनमीत है
मन की भाषा समझती है
सांसों में मेरे बसती है
हाथों की रंगत बढाती है
दिल की धड़कन बन......
दिल को धड़काती है
जो बोलो पन्नों पर उतारती है
क्या इसकी तारीफ करें
यह मेरी सर्वस्व धन है
मेरे जागने से पहले....
तैयार बैठी रहती है
तर जाती इसको पाकर
जब हौले से आकर.....
हाथों को निहाल करती है
मेरी कलम मुझसे.......
बेपनाह प्यार करती है।।
-ममता तिवारी
5 महीने पहले
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