मेरी कलम हंसती भी है
मेरी कलम रोती भी है
ये खाती भी है
पीती भी है
जागती भी है
सोती भी है
नाचती भी है
गाती भी है
उठती भी है
बैठती भी है
चलती भी है
रूकती भी है
भेद मन की खोलती भी है
सच-सच बोलती भी है
शांति चाहती भी है
क्रांति लाती भी है
ना किसी से डरती है
ना किसी से लड़ती है
मेरी कलम मनमीत है
मन की भाषा समझती है
सांसों में मेरे बसती है
हाथों की रंगत बढाती है
दिल की धड़कन बन......
दिल को धड़काती है
जो बोलो पन्नों पर उतारती है
क्या इसकी तारीफ करें
यह मेरी सर्वस्व धन है
मेरे जागने से पहले....
तैयार बैठी रहती है
तर जाती इसको पाकर
जब हौले से आकर.....
हाथों को निहाल करती है
मेरी कलम मुझसे.......
बेपनाह प्यार करती है।।
-ममता तिवारी