आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरी कलम हंसती भी है:कविता

                
                                                         
                            मेरी कलम हंसती भी है
                                                                 
                            
मेरी कलम रोती भी है
ये खाती भी है
पीती भी है
जागती भी है
सोती भी है
नाचती भी है
गाती भी है
उठती भी है
बैठती भी है
चलती भी है
रूकती भी है
भेद मन की खोलती भी है
सच-सच बोलती भी है
शांति चाहती भी है
क्रांति लाती भी है
ना किसी से डरती है
ना किसी से लड़ती है
मेरी कलम मनमीत है
मन की भाषा समझती है
सांसों में मेरे बसती है
हाथों की रंगत बढाती है
दिल की धड़कन बन......
दिल को धड़काती है
जो बोलो पन्नों पर उतारती है
क्या इसकी तारीफ करें
यह मेरी सर्वस्व धन है
मेरे जागने से पहले....
तैयार बैठी रहती है
तर जाती इसको पाकर
जब हौले से आकर.....
हाथों को निहाल करती है
मेरी कलम मुझसे.......
बेपनाह प्यार करती है।।
-ममता तिवारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर