बन जाऊँ मैं पेड़ धरा पर,
किसी गांव में उग जाऊँ।
कृषकों के तन पर गरमी में,
छतरी बन कर छा जाऊँ।।
बन जाऊँ बादल सावन का,
और गांव पर घिर आऊँ।
कृषकों के सूखे खेतों पर,
झर - झर जल मैं बरसाऊँ।।
बन कर पुष्प गांव में महकूँ,
हरे खेत में सज जाऊँ।
खेतों से लेकर गलियों तक,
मधुर गंध फिर विखराऊँ।।
बन कर तितली रंग - बिरंगी,
चलूँ गांव में मंडराऊँ।
हरा स्वर्ण उपजाते हैं जो,
उन कृषकों से बतिआऊँ।।
या फिर कोयल बनूं गांव में,
ऊँची कूक सुनाऊँ।
कृषकों के श्रम की महिमा को,
सदा सर्वदा गाऊँ।।