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कविताओं के बीच कहीं तुम

LOKESH KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कविताओं के बीच कहीं तुम—
        
                                                    
                            
जैसे किसी पुराने ख़त में
अचानक मिल जाए
सूखे हुए फूल की ख़ुशबू,
जिसका मौसम बीत गया हो,
मगर महक अब भी बाक़ी हो।

तुम प्रेम नहीं,
प्रेम के बाद बची
वो ख़ामोशी हो—
जिसमें दुःख भी अपना लगता है
और सुख,
अजनबी चिड़िया-सा
हथेली पर आ बैठता है।

मैंने तुम्हें चाँद में नहीं खोजा,
तुम तो उस आख़िरी तारे में मिलीं
जो सुबह से पहले
सबसे देर तक जागता रहा।

अब जब लिखता हूँ,
शब्द तुम्हारा नाम नहीं लेते,
बस हर पंक्ति में
एक ख़ाली जगह छोड़ देते हैं—
और मैं जानता हूँ,
कविताओं के बीच कहीं
तुम अब भी हो।

शायद प्रेम यही है—
किसी को पा लेना नहीं,
बल्कि उसके होने से
अपने भीतर की दुनिया को
थोड़ा और ख़ूबसूरत पा लेना।
2 घंटे पहले
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