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ग़ज़ल: प्यार हूँ मैं आपकी ही मंज़िले- मक़सूद हूँ

L.J. Bhagia

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            प्यार हूँ मैं आपकी ही मंज़िले- मक़सूद हूँ
        
                                                    
                            
ज़िन्दगी में आपकी मैं हर जगह मौजूद हूँ

जब से पाया आपको मैं हर तरह आसूद हूँ
ग़म मगर इक है कि मैं ख़ुद से ही अब मफ़क़ूद हूँ

बेवफ़ाई से भी वाक़िफ़ हूँ बहुत अच्छी तरह
मैं दयारे-इश्क़ से लौटा हुआ मरदूद हूँ

सर उठाने के लिये की कोशिशें मैंने बहुत
चाह में इस सरफ़रोशी के हुआ नाबूद हूँ

प्यार में पागल हूँ शायद, इस लिये समझा नहीं
क्यूँ कभी गुज़रा मैं हद से,क्यूँ अभी महदूद हूँ

जी रहे हैं लोग उम्मीदे-बहाराँ में सभी
भीड़ का हिस्सा हूँ मैं भी इक ख़िज़ाँ-आलूद हूँ

रोकने की कोई कोशिश अब न करना ऐ सनम
रुक नहीं सकता अभी मैं माइले- बहबूद हूँ

नाम है 'ख़ामोश' मेरा, कुछ नहीं कहता मगर
आप हल्के में न लें मुझको मैं इक बारूद हूँ

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4 वर्ष पहले
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