आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ग़ज़ल: प्यार हूँ मैं आपकी ही मंज़िले- मक़सूद हूँ

                
                                                         
                            प्यार हूँ मैं आपकी ही मंज़िले- मक़सूद हूँ
                                                                 
                            
ज़िन्दगी में आपकी मैं हर जगह मौजूद हूँ

जब से पाया आपको मैं हर तरह आसूद हूँ
ग़म मगर इक है कि मैं ख़ुद से ही अब मफ़क़ूद हूँ

बेवफ़ाई से भी वाक़िफ़ हूँ बहुत अच्छी तरह
मैं दयारे-इश्क़ से लौटा हुआ मरदूद हूँ

सर उठाने के लिये की कोशिशें मैंने बहुत
चाह में इस सरफ़रोशी के हुआ नाबूद हूँ

प्यार में पागल हूँ शायद, इस लिये समझा नहीं
क्यूँ कभी गुज़रा मैं हद से,क्यूँ अभी महदूद हूँ

जी रहे हैं लोग उम्मीदे-बहाराँ में सभी
भीड़ का हिस्सा हूँ मैं भी इक ख़िज़ाँ-आलूद हूँ

रोकने की कोई कोशिश अब न करना ऐ सनम
रुक नहीं सकता अभी मैं माइले- बहबूद हूँ

नाम है 'ख़ामोश' मेरा, कुछ नहीं कहता मगर
आप हल्के में न लें मुझको मैं इक बारूद हूँ

हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर