धरती की कोख में दबा एक नन्हा बीज,
जब अंकुरित हुआ ।
शनै शनै बदला ,
एक विशाल वृक्ष में।
बाहें फैलाए संभाला उसने,
उड़ती चिड़िया को,
मचलती तितलीयो को,
उछल कूद करते बंदरों को,
गीत गाती कोयलों और
प्रीतम की विरह में डूबी पपीहो को,
घूमती चींटिया,
जालो में लगी मकड़ियां,
या कंदरे में छुपे जीव,
सबके लिए सर्वस्व लुटाया,
न अपना,न पराया,
बिना किसी भेद भाव के,
दिया आश्रय,भोजन और खुशियां।
कितना सुंदर था ये ताना बाना,
सबको था ,सबसे निभाना ।
फिर,मनुष्य एक जीव आ गया ।
अपने स्वार्थ की भूख में ,
वो सब खा गया।
विकास के नाम पर,
अपने साम्राज्य की शान पर,
काट दिए सदियों के तप को।
खत्म किया प्रकृति के जप को।
कोई तो फिर आएगा,
एक नन्हा बीज धरती में दबाएगा।
फिर गूंजेगी ,
चिड़ियों की चहचह,
धरती फिर से होगी लहलह।
-कुमारी प्रियंका