विज्ञापन

गौरैया

Kulbhushan Choudhary

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सुबह सवेरे जब नींद सुहाती,
        
                                                    
                            
खिड़की पर ठक ठक करके,
नींद से तू मुझे रोज जगाती,
जब से पेड़ कटा आंगन का,
रहने लगी थी तू उदास,
इंसानों संग रहने की खातिर,
रोशनदान को घर बना कर,
उसमें अपना संसार बसाया,
फिर आई AC की बारी,
रोशनदान भी बंद कराया,
AC लगने से पहले तुमने,
याद है कैसा था शोर मचाया,
कोई न जान सका तेरे मन को,
सबने तुझको दूर भगाया,
ओ री गौरैया कहां है तू,
और कहां गई तेरी चीं चीं गौरैया,
कौन जगाए ठक ठक करके,
तुझ को मिस करते हैं गौरैया.
-कुल भूषण
 
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anurag vishwkarma (aiyaar)

8 कविताएं

View Profile

Priya Mehra

1 कविता

View Profile