उमर बीत चली दिल को समझाते समझाते,
कमबख्त जिद्दी दिल है कि मानता ही नहीं,
जो दावा करता था, तुम बिन भी क्या जीना,
गुज़र जाता है पास से जैसे जानता ही नहीं,
बंजारा जो हमें देख गाता था प्यार के नगमें,
चला जाता है पास से गोया पहचानता ही नहीं,
तेरा शहर जो गाता था प्यार के तराने हमारे,
हर बशर भूल गया है जैसे जानता ही नहीं,
भूलना चाहता हूं तेरे साथ गुजारे वो लम्हें,
दिल का क्या करूं पागल है मानता ही नहीं,
भूल कर वादा किसी और का दामन थामना,
तेरी बेवफाई का सबब मैं जानता ही नहीं,
याद है हर वो लम्हा जो गुजरा था तेरे साथ,
रूह में इस कदर समाए हैं कि,
चाहते हुए भी दिल भूलना जानता ही नहीं...
-कुल भूषण