आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक गजल

                
                                                         
                            उमर बीत चली दिल को समझाते समझाते,
                                                                 
                            
कमबख्त जिद्दी दिल है कि मानता ही नहीं,

जो दावा करता था, तुम बिन भी क्या जीना,
गुज़र जाता है पास से जैसे जानता ही नहीं,

बंजारा जो हमें देख गाता था प्यार के नगमें,
चला जाता है पास से गोया पहचानता ही नहीं,

तेरा शहर जो गाता था प्यार के तराने हमारे,
हर बशर भूल गया है जैसे जानता ही नहीं,

भूलना चाहता हूं तेरे साथ गुजारे वो लम्हें,
दिल का क्या करूं पागल है मानता ही नहीं,

भूल कर वादा किसी और का दामन थामना,
तेरी बेवफाई का सबब मैं जानता ही नहीं,

याद है हर वो लम्हा जो गुजरा था तेरे साथ,
रूह में इस कदर समाए हैं कि,
चाहते हुए भी दिल भूलना जानता ही नहीं...
-कुल भूषण 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर