हम पंछी आजाद ख्याल के,
उड़ते नील गगन में।
सारा जहां है घर अपना,
बसें कहीं हैं, अपनें चमन में।।१।।
ब्रह्मा की श्रृष्टि में एक,
बहुल जातिऔर रूप अनेक।
विपुल रंग और विपुल ढंग में,
रहते मस्त हम अपनी धुन में।।२।।
मेरा तो जुड़ता समाज है,
चाहे सबका अलग राज हो।
रागाश्रित नहीं है हममें,
ईर्ष्या नहीं है मेरे मन में।।३।।
भूल अतीत ,वर्तमान में हैं जीते,
भावी ओझल, सुख के अमृत पीते।
मालिक के अनुरूप समर्पित,
खुश रहते हैं हम जीवन में।।४।।
प्रकृति के नजदीक रहें हम,
ताल मेल कर संग चलें हम।
प्रदूषण कृत आरोप मुक्त हो,
मस्त पड़ें हैं अपनें चमन में।।५।।
हसरत बड़ी ऊंचा उड़ना है,
भौतिकता से परे रहना है।
अपरिग्रह सिद्धांत हमारा,
चोला हरदम रहे मगन में।।६।।
-कृष्ण मुरारी पाण्डेय