अकेले छूट जाने का,
मुझे अब डर नहीं लगता!
मैं ऐसे मौन बैठी हूं,
मुझे घर, घर नहीं लगता!!
कहीं कितनी भी हलचल हो,
मुझे कुछ होश थोड़ी है!
कोई घुट जाए अंदर ही,
मेरा कुछ दोष थोड़ी है!!
इन इल्ज़ामों के खेलों से,
मेरा लेना न देना है!
दोष हर बार जो मुझको,
मेरे ही सर पे लेना है!!
मुझे लत लग पड़ी ऐसी,
अकेली चांद रातों की!
नहीं परवाह है मुझको,
यू बेमतलब की बातों की!!
मैं खुद ही त्याग दूं सबकुछ,
कि मेरा बस नहीं चलता!
मैं ऐसे मौन बैठी हूं,
मुझे घर, घर नहीं लगता!!
-कोमल शर्मा