अधूरी प्रतीक्षा का यह मूक सावन,
न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।
अधूरी प्रतीक्षा का यह मूक सावन,
न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।
हवाओं ने लाकर सँदेसा दिया है,
कि वसंत का लौट आना नियति है,
मगर पंख तोड़े हुए एक खग की,
व्यथा कह रही रूठ जाना नियति है,
इसी भंवर में घिर चुकी चेतना के,
न हिस्से जुड़े हैं, न टुकड़े बँटे हैं।
अधूरी प्रतीक्षा का यह मूक सावन,
न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।
कहा था समय ने कि तुम भूल जाओ,
स्मृतियों की भस्म सौंप दो अब पवन को,
मगर यह विकल आत्मा चाहती है,
समर्पित करूँ मैं इसी एक क्षण को,
सुलगती हुई इन दिशाओं के भीतर,
न लौ जगमगाई, न साये हटे हैं।
अधूरी प्रतीक्षा का यह मूक सावन,
न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।
भला कौन सी सीपियों ने सजल हो,
बिना प्यास के स्वाति-बूँदें सजाईं?
बिना चोट खाए तराशे गए कब,
कहाँ पत्थरों ने सजीवता पाई!
कठिन इस नियति के छलावे में आकर,
न फैले हैं सपने, न दुख सिमटे हैं।
अधूरी प्रतीक्षा का यह मूक सावन,
न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।
किसे है ख़बर इस भ्रमित चेतना में,
कहाँ काल ने पाश अपना कसा है?
किसे ज्ञात है भस्म होती चिता में,
नया कौन सा प्रात इसमें बसा है!
अजब इस विधाता की माया के पन्ने,
न बांचे गए हैं, न खुद पलटे हैं।
अधूरी प्रतीक्षा का यह मूक सावन,
न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।
-भानु शर्मा रंज