ज़ख्म वह अब तलक नासाज़ है।
किंतु रोता नहीं, जांबाज़ है।
यार! तुम और मत खोदो उसे;
वहाँ नासूर का अब राज है।
दिये हैं ज़ख्म काफ़ी बज़्म ने,
किंतु तेरा दिया सरताज़ है।
भुलाया है बहुत कुछ अब तलक,
फ़क़त तुम ही न बिसरी, नाज़ है।
निविड़ यादें तुम्हारी अनगिनत,
लगें घेरे हुए अफ़वाज है।
अगर अपलक निहारूँ ज़ख्म वो,
निकल पड़ती दुखित आवाज है।
करीं हैं गुफ़्तगू उस ज़ख्म पर,
किन्तु सच राज़ रक्खा, लाज है।
तुम्हारी इक झलक भी ज़ख्म को
‘दक्ष’ देती नई परवाज़ है।