आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अगर अपलक निहारूँ ज़ख्म वो,

                
                                                         
                            ज़ख्म वह अब तलक नासाज़ है।
                                                                 
                            
किंतु रोता नहीं, जांबाज़ है।

यार! तुम और मत खोदो उसे;
वहाँ नासूर का अब राज है।

दिये हैं ज़ख्म काफ़ी बज़्म ने,
किंतु तेरा दिया सरताज़ है।

भुलाया है बहुत कुछ अब तलक,
फ़क़त तुम ही न बिसरी, नाज़ है।

निविड़ यादें तुम्हारी अनगिनत,
लगें घेरे हुए अफ़वाज है।

अगर अपलक निहारूँ ज़ख्म वो,
निकल पड़ती दुखित आवाज है।

करीं हैं गुफ़्तगू उस ज़ख्म पर,
किन्तु सच राज़ रक्खा, लाज है।

तुम्हारी इक झलक भी ज़ख्म को
‘दक्ष’ देती नई परवाज़ है।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर