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मेरी तो कुल मता-ए-ज़ीस्त भी तुम हो

KATIB.31 (MD

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समझती क्यों नही हो तुम कि क्या हूँ मैं
        
                                                    
                            
जमीं पे बोझ और इक बद्दुआ हूँ मैं

मैं जब तक हूँ नही कुछ डूबने दूँगा
तुम्हारी कश्ती का ही नाखुदा हूँ मैं

फ़क़त तुमसे ही कोई खास रिश्ता है
जहाँ में बाकियों से तो जुदा हूँ मैं

मेरी तो कुल मता-ए-ज़ीस्त भी तुम हो
तुम्हारे वास्ते ही जी रहा हूँ मैं

सफऱ से आज वर्षों बाद लौटा हूँ
मुझे देखो मुझे अब थक गया हूँ मैं

 
एक घंटा पहले
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