समझती क्यों नही हो तुम कि क्या हूँ मैं
जमीं पे बोझ और इक बद्दुआ हूँ मैं
मैं जब तक हूँ नही कुछ डूबने दूँगा
तुम्हारी कश्ती का ही नाखुदा हूँ मैं
फ़क़त तुमसे ही कोई खास रिश्ता है
जहाँ में बाकियों से तो जुदा हूँ मैं
मेरी तो कुल मता-ए-ज़ीस्त भी तुम हो
तुम्हारे वास्ते ही जी रहा हूँ मैं
सफऱ से आज वर्षों बाद लौटा हूँ
मुझे देखो मुझे अब थक गया हूँ मैं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X