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मैं, केवल मैं

कौशलेंद्र

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वह लिखता है
        
                                                    
                            
न्याय की
कई परिभाषायें
अलग-अलग रंग के अक्षरों से
जिसकी जैसी जाति
उसके लिए वैसी परिभाषा।
ईश्वर का श्राप
लगे तो लगे
कैसे भी करके
राजसिंहासन तो मिले।

अचंभित हैं जातियाँ
कोई हँसती हुयी
कोई रोती हुयी
अचंभित सभी हैं।
उन्हें इस्तीफा चाहिए
क्योंकि एक ने
नकल होने दी
उन्हें फिर इस्तीफा चाहिए
क्योंकि दूसरे ने
नकल नहीं होने दी
उन्हें अधिकार है
इस्तीफा माँगने का
क्योंकि यह अधिकार
उन्हें दिया है
उनके बाबा ने
और वे हैं
अपने बाबा के
अपने नानबायोलाॅजिकल के
अपने परमपूज्य मोहन के
दुलारे
और नकचढ़े
तिलचट्टे।
एक घंटा पहले
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