एक दिन मैं उड़ रहा था,
बहुत ऊपर आसमान में,
बादलों पर चल रहा था,
तारों को मैं चुन रहा था।
चाँद मिला तो हाथ बढ़ाया,
उससे कुछ बातें कर आया,
हवा ने धीरे से सहलाया,
सपनों ने फिर मुझे बुलाया।
पंछी बनकर दूर निकलता,
नीले नभ में रंग मैं भरता,
धरती नीचे छोटी लगती,
दुनिया जैसे सपना लगती।
न कोई डर था, न कोई बंधन,
खुला हुआ था सारा गगन,
मन की सारी चाहत लेकर,
उड़ता जाता था मैं हँसकर।
फिर आँख खुली तो जाना,
वो था बस सपनों का फ़साना,
पर आज भी जब आँखें मूँदूँ,
उसी आसमान में खुद को ढूँढूँ।
- कमल किशोर झा