विज्ञापन

अँधेरी रात में भी

जनवादी ग़ज़लकार

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अँधेरी रात में भी ख़्वाब उजले देखते रहते
        
                                                    
                            
जहाँ सहरा, वहाँ भी हम जलाशय ढूँढ़ते रहते

मुकद्दर को बुरा कहकर कहाँ तक कोसते रहते
ख़ुदा का नाम कब तक बैठकर हम ओटते रहते

हम अपने आँसुओं को मानते अपनी निजी दौलत
मगर खुशियों को अपने दोस्तों में बाँटते रहते

तनिक अफ़सोस करके काम पर हम फिर से लग जाते
बनाते हैं नए बरतन, पुराने टूटते रहते

जिसे तुम घोंसला कहते, वो पहली पाठशाला है
वहीं चूजे उड़ानों के सभी गुर सीखते रहते

जो छायादार भी हों और जिनमें फल लगें ज़्यादा
वही पौधे लगाए जाएँ, अक्सर सोचते रहते

नहीं परवाह करते हैं कभी गहरी खदानों की
कहाँ मिल जाए, कब हीरा उतरकर खोजते रहते
- डी एम मिश्र
3 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Saleem Javed

2 कविताएं

View Profile

Amit Kumar

129 कविताएं

View Profile

Saurabh Joshi

10 कविताएं

View Profile

Ankit sengar

19 कविताएं

View Profile