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अँधेरी रात में भी

                
                                                         
                            अँधेरी रात में भी ख़्वाब उजले देखते रहते
                                                                 
                            
जहाँ सहरा, वहाँ भी हम जलाशय ढूँढ़ते रहते

मुकद्दर को बुरा कहकर कहाँ तक कोसते रहते
ख़ुदा का नाम कब तक बैठकर हम ओटते रहते

हम अपने आँसुओं को मानते अपनी निजी दौलत
मगर खुशियों को अपने दोस्तों में बाँटते रहते

तनिक अफ़सोस करके काम पर हम फिर से लग जाते
बनाते हैं नए बरतन, पुराने टूटते रहते

जिसे तुम घोंसला कहते, वो पहली पाठशाला है
वहीं चूजे उड़ानों के सभी गुर सीखते रहते

जो छायादार भी हों और जिनमें फल लगें ज़्यादा
वही पौधे लगाए जाएँ, अक्सर सोचते रहते

नहीं परवाह करते हैं कभी गहरी खदानों की
कहाँ मिल जाए, कब हीरा उतरकर खोजते रहते
- डी एम मिश्र
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2 घंटे पहले

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