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ओनाके वाली ओबाव्वा

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सात मंडलों का किला, एलुसुतिना कोटे महान,
        
                                                    
                            
बंगलूरू से दूर उत्तर में, चित्रदुर्ग का गौरव गान।
सत्रह सौ उन्यासी की बात, हैदर की सेना घेरे द्वार,
किले पर घेरा डाले, करे घात का विचार।

एक गुप्त संकीर्ण दरार थी, किंडी कहलाती थी,
दुश्मन को भीतर लाने की, वही राह आती थी।
पहरे पर था हनुमा, कहले मुड्डा नाम,
भोजन को गया था घर, चौकी छोड़ी उस धाम।

पीछे थी ओबाव्वा, साधारण सी नारी,
रसोई संभाले बैठी, पर मन से सबसे भारी।
किंडी से आती आहट, सुनी कान लगा कर,
दुश्मन घुस रहे चुपके, धीरे-धीरे सरक कर।

न तलवार थी पास, न युद्ध का ज्ञान था,
रसोई में रखा ओनाके, बस वही महान था।
धान कूटने वाला मूसल, हाथों में उठा लिया,
काल बन कर किंडी पर, उसने डेरा लिया।

एक-एक कर घुसता, हैदर का जवान,
मूसल का वार पड़ता, जाता उसकी जान।
सिर फटता, धरा गिरता, बिना शोर-शराबा,
शव को खींच किनारे, फिर से होती खड़ा।

रक्त से सना ओनाके, शवों का ढेर लगा,
अकेली अबला ने, सेना को मार गिरा।
पति लौटा जब देखा, दंग रह गया वीर,
खून से लथपथ मूसल, और शौर्य की तस्वीर।

उस दिन किले की लाज, एक नारी ने बचाई,
ओनाके ओबाव्वा ने, अमर कथा रचाई।
आज भी वो किंडी, ओबाव्वाना किंडी कहलाती,
मूसल वाली माता की, गाथा हमें सुनाती।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
एक घंटा पहले
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