जिंदगी के अंत में, समझ ये आई है,
सबसे सच्चा साथी, खुद की परछाई है॥
बहुत देखे हैं रिश्ते, बहुत देखे हैं मेले,
भीड़ में भी देखा, लोग हैं कितने हैं अकेले॥
आस-पास के घरों में, बुजुर्गों को देखा है,
संवेदना से उनके, दर्द को समझा है॥
बेटा-बेटी ऊँचे पद पर हैं, घर में दौलत सारी है,
फिर भी आँखों में उनकी, एक गहरी लाचारी है॥
नौकर-चाकर, महल-दुमहला, कोई कमी नहीं है,
पर दो घड़ी पास बैठे, ऐसा कोई नहीं है॥
उनकी झुकी कमर ने, मुझको आगाह किया है,
आने वाले कल का, दर्पण साफ दिखा दिया है॥
इसी रास्ते से मुझको भी, एक दिन गुजरना है,
इस सच को अब तो, खुल कर स्वीकारना है॥
चाहे कितने भी लोग हों, जीवन के संग में,
अंतिम यात्रा तो होती, खुद के ही रंग में॥
सुख-दुख के भँवर में, जब कोई न आएगा,
तब अपने भीतर का, दीपक ही जल जाएगा॥
बेटा साथ न देगा, बेटी भी दूर होगी,
भीड़ तो होगी घर में, पर आत्मा मजबूर होगी॥
तब समझ आएगा, बाहर का साथ क्या है,
अपने भीतर की ताकत ही, सच्चा साथ क्या है॥
इसलिए अभी से खुद से, दोस्ती गहरी कर लो,
अपने मन को अपना, सबसे बड़ा साथी कर लो॥
दुनिया का क्या है, आती-जाती रहती है,
पर खुद की आत्मा तो, सदा साथ रहती है।।