मन की बेड़ियाँ
ये बेड़ियाँ कुछ भी नहीं,
मन की गढ़ी परछाइयाँ हैं,
कड़ियाँ जोड़ें, मन को बाँधें,
मन की ही ये परछाइयाँ हैं।
कहती हैं— “रुक जा, थम जा,
इस राह से आगे मत बढ़,
तेरे कदमों में बल ही क्या,
अपने सपने यहीं छोड़ दे।”
पर मानव तो वह कहलाए,
जो हर बंधन तोड़ दिखाए,
अदम्य साहस को हथियार बना,
हर बाधा को पीछे छोड़ जाए।
राही अक्सर राहों में ही
काँटों से घबरा जाते हैं,
राह में आए हर पत्थर को
अपनी बेड़ी बतलाते हैं।
पर ज़रा तू सोच तो राही—
कब साधन राह रोक पाए?
जिसके भीतर ज्वाला जलती,
कब उसके कदम रुक पाए?
ऊँचे लक्ष्य माँगते जीवन
हौसलों की ऊँची उड़ान,
पंख नहीं, विश्वास चाहिए,
तभी मिले खुला आसमान।
हाथी में अपार है शक्ति,
फिर भी महावत की मानता,
बंधन बाहर कम होते हैं,
मन ही मन को बाँधता।
तू भी अपनी बेड़ी खोल दे,
मन की सारी गाँठें खोल दे,
दिल में पड़ी हर जंजीर को
आज ही तोड़ दे—तोड़ दे।
लक्ष्य तुझे बुला रहा है, राही,
क्यों अब तक तू ठहरा है?
जिस राह को खोज रहा तू,
वह रास्ता तेरे भीतर है।
उठ, अपने कदम बढ़ा राही,
हर डर को पीछे छोड़ दे,
केवल अपनी राह न बना तू,
किसी और की राह भी खोल दे।
किसी की उम्मीद बनकर चल,
किसी के सपनों को उड़ान दे,
तू खुद एक दीपक बनकर
किसी अँधेरे को प्रकाश दे।
याद रख— ये बेड़ियाँ तो
मन के भीतर ही होती हैं,
मन जिस दिन आज़ाद हुआ,
उस दिन राहें अपनी होती हैं।