ये हुस्न ओ इश्क़ शरारत और प्यार की बातें
बहुत जरूरी हैं लेकिन ,बेकार की बातें ।।
ये इश्क़ विश्क़ फ़क़त चार दिन का किस्सा है।
फ़िर शुरू होती हैं उनमें तकरार की बातें ।।
हमें हर रोज़ मुहब्बत सिखाई जाती हैं।
सुनता रहता हूं मैं अपनी सरकार की बातें।।
अब तो उल्फ़त में क़रीब आना ही जरूरी है।
वो दौर बीत गया जब थी दीदार की बातें।।
ये कैसा प्यार है जो रोज़ बदल जाता हैं।
मैं रोज़ सुनता हूं एक नए शिकार की बातें।।
अब तो आपस में बस समझौते किए जाते हैं।
कहां अब होती हैं इश्क़ ओ इज़हार की बातें ।।
मैं उस तन्हाई का कैसे भला यक़ीन करूं ।
बाहर जब आती हैं अंदर दीवार की बातें।।
ये प्यार व्यार अब "मेंहदी" के बस की बात नहीं ।
आप तो करते रहें बस अशआर की बातें।।
-इक़बाल मेंहदी काजमी