उसकी परिधि को ही , अपना संसार लिखूंगी मैं ।
हर मौसम को बहार लिखूंगी मैं,
फिर उस पर अपना अधिकार लिखूंगी मैं ।।
अभी यही है , जो मैनें लिखा ।
प्रेम मिले , फिर शृंगार लिखूंगी मैं। ।