विज्ञापन

मां और वह सितंबर

GVA ACADEMY

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            माँ — वह सितंबर
        
                                                    
                            

वह सितंबर की रात थी,
माँ जीवन से लड़ती थीं,
अस्पताल की दीवारों में
मेरी साँसें अटकती थीं।

नाजुक हालत, सूनी आँखें,
मन में उठते लाख सवाल,
दुआ लिए मैं भटक रहा था,
अस्पताल की ठोकर खा-खाकर बेहाल।

गुजरे दिनों की यादें लेकर
चुपके-चुपके रोता था,
माँ की पीड़ा अपने भीतर
हर पल थोड़ा-थोड़ा ढोता था।

एक महीना जैसे युग बीता,
फिर माँ स्वस्थ हुईं धीरे-धीरे,
आज उसी दिन को साल हुआ है,
माँ मुस्काईं फिर से मेरे लिए।

उस कठिन समय ने सिखलाया—
माँ से बढ़कर कुछ भी नहीं,
माँ की साँसें चलती रहें तो
दुनिया में फिर कोई कमी नहीं।
— विपिन अवस्थी
5 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Pandey

461 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10782 कविताएं

View Profile