माँ — वह सितंबर
वह सितंबर की रात थी,
माँ जीवन से लड़ती थीं,
अस्पताल की दीवारों में
मेरी साँसें अटकती थीं।
नाजुक हालत, सूनी आँखें,
मन में उठते लाख सवाल,
दुआ लिए मैं भटक रहा था,
अस्पताल की ठोकर खा-खाकर बेहाल।
गुजरे दिनों की यादें लेकर
चुपके-चुपके रोता था,
माँ की पीड़ा अपने भीतर
हर पल थोड़ा-थोड़ा ढोता था।
एक महीना जैसे युग बीता,
फिर माँ स्वस्थ हुईं धीरे-धीरे,
आज उसी दिन को साल हुआ है,
माँ मुस्काईं फिर से मेरे लिए।
उस कठिन समय ने सिखलाया—
माँ से बढ़कर कुछ भी नहीं,
माँ की साँसें चलती रहें तो
दुनिया में फिर कोई कमी नहीं।
— विपिन अवस्थी
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