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माथे का टीका...

Ghumnam Gautam

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दर्द सहलाया मैंने जब भी,
        
                                                    
                            
दर्द ज़ोर से चीखा था...
अदब दिखाने का उसका
अपना अज़ब सलीका था...

यूं तो लाल ही था आज भी सूरज,
पर रंग जरा-सा फ़ीका था...
रात के सीने में चाँद नहीं था,
उसके माथे का टीका था...

सीना टटोला, कुछ मिला न अपना
ये दर्द भी शायद उसी का था...
उसके बगैर भी कई बार चखा है
हरबार ही जीवन फ़ीका था...

उसने तो सीखा था इश्क़ ही मुझसे
तोड़ना कहां दिल सीखा था...
लकीरें और वक़्त भी ख़तावार थे
दोष कहाँ फ़क़त उसी का था..!

- घुमनाम गौतम
बेगूसराय,बिहार

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7 वर्ष पहले
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