माथे का टीका...

                
                                                             
                            दर्द सहलाया मैंने जब भी,
                                                                     
                            
दर्द ज़ोर से चीखा था...
अदब दिखाने का उसका
अपना अज़ब सलीका था...

यूं तो लाल ही था आज भी सूरज,
पर रंग जरा-सा फ़ीका था...
रात के सीने में चाँद नहीं था,
उसके माथे का टीका था...

सीना टटोला, कुछ मिला न अपना
ये दर्द भी शायद उसी का था...
उसके बगैर भी कई बार चखा है
हरबार ही जीवन फ़ीका था...

उसने तो सीखा था इश्क़ ही मुझसे
तोड़ना कहां दिल सीखा था...
लकीरें और वक़्त भी ख़तावार थे
दोष कहाँ फ़क़त उसी का था..!

- घुमनाम गौतम
बेगूसराय,बिहार

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
2 years ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
X