विज्ञापन

सूरत ए हाल: दिल्ली की दहशत

गोविन्द कड़वासरा

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिल्ली की दहशत को इस नहज पर लाना,
        
                                                    
                            
तुम्हारी 'महरूमी' को ज़ाहिर करता है।
हुकूमत तुम्हारी है परन्तु इसको मुराक़बे में लाना,
तुम्हारी 'महरूमी' को ज़ाहिर करता है।
अवाम-ए- सरज़मीं का फ़रमान ही तसमीम करता है।
इन ज़ुल्मों की क़ीमत अदा करने नस्ल-ए-आयंदे ज़रूर आएगी,
शमा रोएगी यह देखकर, हालात-ए-ज़ुल्म की हुकूमत का इंतक़ाम।
ये तुम्हारी 'महरूमी' को ज़ाहिर करता है।
इनायत तो तुम्हें भी न आई मूरतासी रौबदारों,
उन लम्हों के दरमियान ही तो मुल्क इसी शरायत पर आया होगा,
तो इनसे क्या इल्तिजा की जाए?
जो कि तुम्हारी 'महरूमी' को ज़ाहिर करता है।
तब शमा अपनी हुकूमत में 'रोशन-दिल' में मस्त थी,
अब नस्ल-ए-जवां अपने इंतक़ाम को मुकम्मल करने में मस्त होगी।
अब ये तुम्हारी 'महरूमी' को ज़ाहिर करता है।
-अनवरत राही
3 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Saleem Javed

2 कविताएं

View Profile

Amit Kumar

129 कविताएं

View Profile

Saurabh Joshi

10 कविताएं

View Profile

Ankit sengar

19 कविताएं

View Profile