दिल्ली की दहशत को इस नहज पर लाना,
तुम्हारी 'महरूमी' को ज़ाहिर करता है।
हुकूमत तुम्हारी है परन्तु इसको मुराक़बे में लाना,
तुम्हारी 'महरूमी' को ज़ाहिर करता है।
अवाम-ए- सरज़मीं का फ़रमान ही तसमीम करता है।
इन ज़ुल्मों की क़ीमत अदा करने नस्ल-ए-आयंदे ज़रूर आएगी,
शमा रोएगी यह देखकर, हालात-ए-ज़ुल्म की हुकूमत का इंतक़ाम।
ये तुम्हारी 'महरूमी' को ज़ाहिर करता है।
इनायत तो तुम्हें भी न आई मूरतासी रौबदारों,
उन लम्हों के दरमियान ही तो मुल्क इसी शरायत पर आया होगा,
तो इनसे क्या इल्तिजा की जाए?
जो कि तुम्हारी 'महरूमी' को ज़ाहिर करता है।
तब शमा अपनी हुकूमत में 'रोशन-दिल' में मस्त थी,
अब नस्ल-ए-जवां अपने इंतक़ाम को मुकम्मल करने में मस्त होगी।
अब ये तुम्हारी 'महरूमी' को ज़ाहिर करता है।
-अनवरत राही
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