टूटे पंखों में भी उड़ान देखता हूँ,
मैं कभी आसमाँ, कभी गुमाँ देखता हूँ।
तेरे ज़िक्र से ज़ख़्मों में दहशत है मगर,
मैं अभी दर्द में भी मुस्कान देखता हूँ।
धड़कते दिल पे क़ातिल का रहम बाक़ी है,
मैं उसी तीर में अपना निशान देखता हूँ।
निगाहें ढूँढ़ती हैं वो परिंदा कब से,
मैं किसी शाख़ पे अपना मकान देखता हूँ।
दिल-ए-कायर में भी पलता है कोई शायर,
मैं ख़मोशी में कोई दास्तान देखता हूँ।
-गौरव कुमार पाठक