"श्रद्धा और श्राद्ध”
जीते जी सेवा नहीं, अब कर रहे हो श्राद्ध,
दो वक्त की रोटी को रहते थे मोहताज।
बूढ़ी आँखें राह तकतीं—“कोई अपना आए”,
सूने आँगन में बैठा मन, किससे दर्द बताए?
जीवन भर जिन्होंने उँगली पकड़ चलाया,
अपनी खुशियाँ छोड़कर, जीवन तुम्हारा सजाया।
हर मुश्किल में ढाल बने, हर दुख को सहन किया,
बच्चों की खुशियों के खातिर, अपना सुख भी त्याग दिया।
भूखे-प्यासे माँ-बाप को कभी दिया दुत्कार,
उनकी मजबूरी पर भी न आया दिल में प्यार।
जिन हाथों ने निवाला देकर तुम्हें बड़ा बनाया,
उन्हीं हाथों को बुढ़ापे में क्यों तुमने ठुकराया?
आज उसी के हिस्से में क्यों आया यह एकांत?
जीते जी दो बोल न बोले, मरने पर दिखलाते सम्मान।
थाली में पकवान सजे हैं, तस्वीर पर चढा दी माला,
जीते जी एक निवाला देने में क्यों था तुमने टाला?
आज पुण्य कमाने के लिए मछली रहे चुगाय
भूखे प्यासे माँ-बाप को दिया कभी दुत्तकाय
गंगा में दान, मंदिर में भोग, जगह-जगह करते हो श्राद्ध,
पर घर के वृद्ध माता-पिता को न दे पाए प्रेम और साथ।
“श्रद्धा यदि सच्ची है, तो जीवन में दो सम्मान,
बूढ़े माँ-बाप को जीते जी दो प्रेम भरा स्थान।”
श्राद्ध नहीं, सेवा चाहिए—दिखावा नहीं, दुलार,
जीते जी जो साथ निभाए, वही सच्चा संस्कार।
मृत्यु के बाद फूल चढ़ाना आसान बहुत है आज,
जीते जी मुस्कान दे देना—यही सच्चा है श्राद्ध।
तस्वीर पर माला चढ़ाने से क्या लौटेगा वह प्यार?
जीते जी माँ-बाप को दे दो अपनेपन का अधिकार।
श्रद्धा शब्दों में नहीं, व्यवहार में दिखाई दे,
माँ-बाप के जीते जी, उनके चेहरे पर मुस्कान दिखाई दे।
यही धर्म है, यही कर्म है, यही जीवन का प्रसाद—
जीते जी सेवा कर लो, फिर करना सच्चा श्राद्ध।
- प्रदीप बाबू