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चरैवेति-चरैवेति

Dr BKS Sanjay

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चरैवेति-चरैवेति
        
                                                    
                            
इच्छा से जन्म होता है
कर्म का
और कर्म से फल का
फल से फिर नई इच्छा का

जीवन भर
यही चक्र चलता रहता है
यही चक्र देता है गति
और यही देता है प्रगति भी

जीवन का
यही है सार्वभौमिक सत्य कि
गति ही जीवन है
ठहराव है मृत्यु

सनातन जीवन में
प्रतीक का महत्व है
आज लोकतंत्र में भी
प्रतीक का महत्व है

हमारे राष्ट्र ध्वज में भी है
एक प्रतीक नीला चक्र अशोक का
जो प्रतीक है धर्म का
और कर्म का

जिसका हर
स्थिति और परिस्थिति में
एक है संदेश, चरैवेति-चरैवेति
अर्थात् चलते रहो, चलते रहो

क्योंकि
चराति चरतो भगः
अर्थात्
चलने वाले का भाग्य चलता है

आजादी के पहले
देश का
एक संदेश था
विदेशियों के लिए
भारत छोड़ो
यानी चले जाओ

आज
आजादी के अमृत महोत्सव पर
संदेश है
देशवासियों के लिए

चरैवेति-चरैवेति
यानी चलते रहो, चलते रहो

यही हो हम सबका धर्म
यही हो हम सबका कर्म
बढ़े हम स्वर्णिम् युग की ओर
जहां हो शांति और समृद्धि
चरैवेति-चरैवेति।
एक वर्ष पहले
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