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वह आख़िरी, अंतिम आलिंगन।

Divakar Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            प्रेम की पराकाष्ठा में खोया हुआ पुरुष,
        
                                                    
                            
भूल जाता है अतीत के तमाम सिलसिले,
दफ़न कर देता है अपनी ही यादों के शहर।
समय गुज़रता है, और धुंधला हो जाता है सब कुछ,
मगर उसकी रूह से कभी मिट नहीं पाता—
अपनी प्रियतमा को बांहों में समेटने का
वह आख़िरी, अंतिम आलिंगन।
एक घंटा पहले
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