प्रेम की पराकाष्ठा में खोया हुआ पुरुष,
भूल जाता है अतीत के तमाम सिलसिले,
दफ़न कर देता है अपनी ही यादों के शहर।
समय गुज़रता है, और धुंधला हो जाता है सब कुछ,
मगर उसकी रूह से कभी मिट नहीं पाता—
अपनी प्रियतमा को बांहों में समेटने का
वह आख़िरी, अंतिम आलिंगन।
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