विज्ञापन

याद तुम्हारी आई है

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहुत दिनों के बाद फिर याद तुम्हारी आई है
        
                                                    
                            
लहरें उठी मन मेरे , सिमट गई सारी काई है.

फिसल फिसल जाती स्मृतियाँ द्वार हृदय से
नभ छूकर अब धरा से मिलने सब आई हैं.

सारे स्थल छूट गये एक एक हम जहाँ मिले थे
कुछ प्रस्तर की बची शिलाएं ही हमने पाई हैं.

निर्जन उपवन सघन लताएं सब शुष्क हुईं अब
कंक्रीट की ऊँची बस्ती सहज वहां उग आई है.

अमिट हमारी यादें भी एक एक कर गुम जायेंगी
दूब भरी पगडंडी वो एकदम से पूरी मिट आई है.
-दिनेश चौहान
2 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

dev sachdeva

237 कविताएं

View Profile