बहुत दिनों के बाद फिर याद तुम्हारी आई है
लहरें उठी मन मेरे , सिमट गई सारी काई है.
फिसल फिसल जाती स्मृतियाँ द्वार हृदय से
नभ छूकर अब धरा से मिलने सब आई हैं.
सारे स्थल छूट गये एक एक हम जहाँ मिले थे
कुछ प्रस्तर की बची शिलाएं ही हमने पाई हैं.
निर्जन उपवन सघन लताएं सब शुष्क हुईं अब
कंक्रीट की ऊँची बस्ती सहज वहां उग आई है.
अमिट हमारी यादें भी एक एक कर गुम जायेंगी
दूब भरी पगडंडी वो एकदम से पूरी मिट आई है.
-दिनेश चौहान
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