हज़ारों ख़्वाहिशें हैं,
मगर इन हज़ारों ख़्वाहिशों के बीच
ज़िम्मेदारियों का बोझ है ये ज़िंदगी।
कुछ ख़्वाहिशें
ज़िम्मेदारियों तले दब गईं,
कुछ वक़्त की धूल में कहीं खो गईं,
मगर कुछ ख़्वाहिशें
तमाम मुश्किलों के बाद भी पूरी हो गईं।
कुछ पाने की ख़ुशी मिली,
कुछ खोने का दर्द भी सहा,
कभी ख़ुद के लिए जीने की चाह हुई,
तो कभी अपनों के लिए
अपने ख़्वाबों को पीछे रखा।
हर अरमान का पूरा होना
ज़िंदगी की शर्त नहीं,
कुछ अधूरे ख़्वाब भी
ज़िंदगी का वजूद बन जाते है।