बिन तेरे न खेली जाये ,मेरे सजना ये होली ,
रोते रोते भीग गई है,अब तो मेरी चोली ,
बिन तेरे न खेली जाये ,मेरे सजना ये होली ,
किसी के गालों में अबीर ,किसी के गालों में गुलाल है ,
मेरे सजना तुम साथ नहीं हो,बस आपका ही ख्याल है,
वो गली जो कभी रंग से रंग जाती थी फूलों की तरह ,
उसी रंग बिरंगो बिरंगो रंगो से भरी हुई है झोली ,
पर बिन तेरे न खेली जाये ,मेरे सजना ये होली,
रंग से रँगे है लोग यहाँ,कोई पीला कोई हरा है,
मेरे दिल में आज बस ,तेरे प्यार का रंग भरा है ,
करती हूँ इन्तजार तेरा ,होली के बहाने आ जा अब ,
मेरे जिस्म पर रंगो की तरह ,मेरे सजना समां जा अब
लगता है ये होली है अब ,मेरे अरमानो की डोली,
पर बिन तेरे न खेली जाये ,मेरे सजना ये होली,
रिश्ते जोड़ने के लिए साजन ,सिंदूरी रंग तुम लेते आना ,
मेरे लिए अब गुलाल अबीर ,तुम अपने संग अब लेते आना ,
खेलेंगे मिलकर हम ,याद रखेंगे ये होली ,
मेरे सजना धोखा न देना ,मेरी इस बोली को,
टूटने न देना दिल मेरा ,मै हु बहुत भोली ,
पर बिन तेरे न खेली जाये ,मेरे सजना ये होली,
रोते रोते भीग गई है,अब तो मेरी चोली।
धर्मेंद्र राय
9690346911
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें